राजनीति में बाहुबल और धनबल का बढ़ता प्रभाव
राजनीति में बाहुबल और धनबल का बढ़ता प्रभाव चिंता का विषय
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए इस बार कुल 243 सीटों पर दो चरणों में मतदान होना तय है। पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को 121 सीटों के लिए होगी, जबकि दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को 122 सीटों पर संपन्न होगा। मतगणना 14 नवंबर को की जाएगी।
पहले चरण में बाहुबल और धनबल दोनों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इस चरण में चुनाव लड़ रहे कुल 1,303 उम्मीदवारों में से 519, यानी लगभग 40 प्रतिशत, उम्मीदवार करोड़पति हैं। इन उम्मीदवारों की औसत घोषित संपत्ति 3.26 करोड़ रुपये है। शैक्षणिक योग्यता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो लगभग 40 प्रतिशत प्रत्याशी की शिक्षा 5वीं से 12वीं कक्षा के बीच है, जबकि 651 उम्मीदवार स्नातक या उससे अधिक शिक्षित हैं। वहीं, महिला उम्मीदवारों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है — कुल उम्मीदवारों में से केवल 9 प्रतिशत महिलाएँ हैं।
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का बढ़ता प्रभाव
चुनाव से पहले जारी एडीआर और बिहार इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट में बड़े और चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण के कुल 1,303 उम्मीदवारों में से 423 (32%) उम्मीदवारों ने अपने शपथ पत्र में आपराधिक मामलों का उल्लेख किया है। इनमें से भी 354 (27%) उम्मीदवारों पर हत्या, अपहरण, बलात्कार और महिलाओं पर अत्याचार जैसे गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं। इनमें 33 उम्मीदवारों ने खुद पर हत्या से संबंधित मामले घोषित किए हैं, जबकि 86 पर हत्या के प्रयास के आरोप हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराध से जुड़े मामलों में 42 उम्मीदवार नामजद हैं, जिनमें से 2 प्रत्याशी ने अपने ऊपर बलात्कार के मामले घोषित किए हैं।
प्रमुख राजनीतिक दलों का आपराधिक रिकॉर्ड
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, आपराधिक पृष्ठभूमि के मामले में इस बार वामदलों का रिकॉर्ड सबसे ऊपर है। हालाँकि, अन्य प्रमुख पार्टियों का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कुल 70 उम्मीदवारों में से 53 (76%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 42 (60%) पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 65% यानी 31 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 56% पर गंभीर अपराध के आरोप हैं। कांग्रेस (INC) के 15 उम्मीदवार (65%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU के 57 उम्मीदवारों में से 22 (39%) उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अब लगभग सभी पार्टियाँ चुनाव को सत्ता में बने रहने का बिजनेस मॉडल मानने लगी हैं। जो कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी के लिए समर्पित रहे हैं, उन्हें टिकट देने के बजाय, बाहुबल और धनबल वाले नए चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
मतदाताओं के लिए जागरूकता आवश्यक
एडीआर की रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि उम्मीदवारों द्वारा अपने मामलों को सार्वजनिक करने से पारदर्शिता का स्तर बढ़ा है। अब मतदाताओं को सही जानकारी मिलने से वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं। फिर भी, बड़ी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का मैदान में उतरना लोकतंत्र और शासन व्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे स्वच्छ उम्मीदवारों का चयन प्राथमिकता के आधार पर करें। स्वच्छ भारत का अर्थ केवल सड़कों और नालों की सफाई नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही, और नैतिकता से भी होना चाहिए।
2020 की तुलना में स्थिति और गंभीर
2020 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार आपराधिक मामलों में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों की संख्या घटने के बजाय लगातार बढ़ रही है। इस स्थिति के लिए सभी प्रमुख दल समान रूप से जिम्मेदार हैं, जो सत्ता की राजनीति में आम जनता को भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
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