जन सुराज पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर
क्या प्रशांत किशोर की चुनावी बयार समय से पहले थम गई?
बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरे जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर की शुरूआती चुनावी गति धीरे-धीरे कम होती दिख रही है। उन्होंने पिछले तीन सालों में बिहार का दौरा कर चुनावी माहौल बनाया और पलायन रोकने, युवाओं के लिए नौकरी, बुजुर्गों को मासिक भत्ता, शराब ठेके खोलने, बैंकों के ऋण का स्थानीयकरण जैसे मुद्दों को उठाया, जिससे सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई गई। लेकिन अब उनके लिए कुछ नए विवाद भी उभरे हैं। प्रशांत किशोर का नाम मतदाता सूची में दो जगह पश्चिम बंगाल और बिहार—दर्ज होने की खबर चर्चा में है। उन्होंने बंगाल से अपना नाम हटाने के लिए आवेदन किया है।
साथ ही उन पर यह भी आरोप उठे हैं कि पैसा लेकर उम्मीदवार खड़ा किए जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने साफ कहा कि योग्य और प्रतिबद्ध उम्मीदवार खड़ा करना उनका मकसद है। जन सुराज पार्टी का चुनावी अनुभव सीमित है, जबकि जेडीयू, बीजेपी, आरजेडी और कांग्रेस पहले से ही मजबूत हैं। इसलिए पुरानी पार्टियां इसे गंभीर प्रतियोगी नहीं मान रही हैं।
प्रशांत किशोर ने जातिगत राजनीति और पुराने समीकरणों को चुनौती देने का प्रयास किया, उम्मीदवारों की योग्यता पर वोट देने का संदेश दिया और पार्टी का लक्ष्य कम से कम 150 सीटों पर जीत का रखा। हालांकि उनके खुद चुनाव न लड़ने के फैसले ने जनता में भ्रम पैदा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे संगठन पर ध्यान देंगे और भविष्य में बिहार बदलने की लड़ाई जारी रहेगी।
वर्तमान में कोई गठबंधन उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहा, उनके कई बयान विवादों का कारण बने हैं, और पलायन व रोजगार जैसे मुद्दों पर संतोषजनक प्रभाव सीमित है। एनडीए और महागठबंधन जन सुराज पार्टी को वोटकटवा मानते हैं। जनता में विश्वास बनाने और निर्णायक असर दिखाने के लिए पार्टी को अभी समय और प्रयास की आवश्यकता है। प्रशांत किशोर की चुनावी गति में कमी आई है, लेकिन इसे पूरी तरह थम गया कहना अभी जल्दबाजी होगी।
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