आरजेडी के एम-वाई समीकरण का ‘एम’ (मुस्लिम) भ्रमित क्यों है?

आरजेडी के एम-वाई समीकरण का ‘एम’ (मुस्लिम) भ्रमित क्यों है?

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, असदुद्दीन ओवैसी , वोटर

आरजेडी के एम-वाई समीकरण का एम(मुस्लिम) भ्रमित क्यों है?

बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पारंपरिक एम-वाई समीकरण (मुस्लिम-यादव गठजोड़) में अब दरारें नज़र आने लगा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि आरजेडी अब इस समीकरण को हवा देने से कन्नी काटने लगा है। कुछ हद तक मुस्लिम समुदाय भी अब लालू परिवार से उपेक्षा महसूस कर रहा है। 

एम-वाई फार्मूला सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने 1990 में शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य था यादव और मुस्लिम वोटों को एकजुट करके विपक्षी दलों के मुकाबले वोट प्रतिशत बढ़ाना और मुस्लिम बहुल इलाकों में जीत सुनिश्चित करना। उस समय यादव वोटरों की तुलना में मुस्लिम वोटरों की संख्या भी 2–3 प्रतिशत अधिक थी। तब लालू यादव ने मुसलमानों को सुरक्षा और सम्मान देने का भरोसा दिया, और सरकार में आने के बाद मुस्लिमों को सत्ता में प्रतिनिधित्व भी दिया। इस एमवाई समीकरण को आरजेडी लगातार अपने पाले में रखने को प्राथमिकता देता रहा है। एमवाई के सहारे ही लालू की पार्टी ने खुद को गरीब, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की पार्टी के रूप में स्थापित किया।

 नई पीढ़ी और बदलता राजनीतिक माहौल

मुसलमानों की नई पीढ़ी भी अब आरजेडी की इस रणनीति को पहले जैसा महत्व नहीं दे रही है। मुस्लिम वोटर भी अब जाति-मजहब की जगह विकास और रोजगार के मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। माना जा रहा है कि इस चुनाव में मुस्लिम वोटर एक दल या गठबंधन के अब कई दलों में बँटने लगे हैं। विशेष रूप से पूर्वांचल और सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव एआईएमआईएम (AIMIM) और कांग्रेस की ओर बढ़ा है। मुस्लिम मतदाता अब आरजेडी पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहे हैंइसीलिए एआईएमआईएम सीमांचल में तेजी से अपनी पकड़ बना रही है और पूरे बिहार में पांव पसारने की कोशिश में लगी है।

 प्रतिनिधित्व की कमी

आरजेडी पर यह भी आरोप है कि उसने इस बार मुस्लिम आबादी के अनुपात में उनको टिकट नहीं दिया है। टिकट बंटवारे से लेकर सांगठनिक पदों के वितरण तक, मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुसार स्थान नहीं मिला। इसी कारण मुस्लिम समुदाय में यह धारणा बनी है कि उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। अब मुस्लिम मतदाता सामाजिक-आर्थिक मुद्दों, विकास, और नेताओं की छवि के आधार पर निर्णय लेने लगे हैं। समुदाय के नेताओं का कहना है कि घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद आरजेडी ने कभी किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री जैसे बड़े पद पर नहीं पहुँचाया। मुस्लिम समुदाय महसूस कर रहा है कि एम-वाई समीकरण अब केवल वोट बैंक तक सीमित रह गया है। पहले जैसी रणनीति आरजेडी की ओर से नहीं दिख रही। 

उपमुख्यमंत्री पद को लेकर असंतोष

हाल ही में महागठबंधन ने मुख्यमंत्री पद के लिए तेजस्वी यादव और उपमुख्यमंत्री पद के लिए मुकेश सहनी का नाम घोषित किया। मुकेश सहनी के नाम से मुस्लिम समुदाय में नाराज़गी है, क्योंकि मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 18% है, जबकि मुकेश सहनी के समाज की आबादी मात्र 2% मानी जाती है।

मुस्लिम प्रभाव का घटता दायरा

आरजेडी का मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एकछत्र राज अब समाप्ति की ओर है।
कारण हैं, मुस्लिम प्रतिनिधित्व की कमी, जनसंख्या अनुपात के अनुसार संगठन या मंत्रिमंडल में जगह न मिलना,किसी मुस्लिम चेहरे को उपमुख्यमंत्री के रूप में आगे न लाना, सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का उभरना,कांग्रेस और जेडीयू द्वारा मुस्लिम वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति। मुस्लिम मतदाता अब केवल सुरक्षा का वादा नहीं, बल्कि स्थिर और सक्षम सरकार चाहते हैं। कई मुसलमान नीतीश कुमार को अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

तेजस्वी यादव की सफाई

तेजस्वी यादव ने हाल में कहा है कि वे हिन्दू-मुस्लिम में वोट बैंक का विभाजन नहीं चाहते।
उनका कहना है कि अगर महागठबंधन जीतता है, तो उपमुख्यमंत्री पद अन्य समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिम या अल्पसंख्यक समाज के किसी प्रतिनिधि को भी दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा  अब राजनीति जाति-आधारित नहीं बल्कि विकास-उन्मुख और समावेशी होगी।

नए विकल्प और कांग्रेस पर बढ़ता भरोसा

अब मुस्लिम नेतृत्व के पास विकल्पों की कमी नहीं रही। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस की ओर बढ़ा है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और नफरत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान जैसे संदेशों ने मुस्लिम समुदाय में भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने संसद में अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर मुखरता दिखाई, जिससे मुसलमानों का विश्वास फिर से मजबूत हुआ। दूसरी ओर, एआईएमआईएम ने सीमांचल, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में मुस्लिम युवाओं के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। वहीं नीतीश कुमार ने भी अपने शासन में मुस्लिम समाज के कई चेहरों को शामिल किया, जिससे उनका आधार मज़बूत हुआ है। कांग्रेस ने कई राज्यों में अच्छा प्रदर्शन किया है, जिससे मुसलमान अब कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर विकल्प मानने लगे हैं।

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